BLOG DESIGNED BYअरुन शर्मा 'अनन्त'

शुक्रवार, 16 मई 2014

उदंती में प्रकाशित हाइकु

उदंती में प्रकाशित कुछ नए हैकुज़ उदंती पत्रिका के लिंक के साथहार्दिक आभार आदरणीय +Rameshwar Kamboj  भैया जी का जिन्होंने उदंती में हाइकू प्रकाशित करवाया | आप दो सदा ही मेरे लिए प्रेरणा श्रोत रहें है  |आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की सदा आकांक्षी रहती हूँ |

http://www.udanti.com/2014/04/blog-post_1291.html

१) सूरज चाँद माँ कि सेवा करें 
पारियाँ बांध
२)

है सप्ताहांत
चहक रहे चूजे 
चिड़ी उदास 

३)
कैसे हो तुम 
कामकाजी दम्पत्ति 
चैट में पूछे

४)
मिले परिंदे 
सप्ताहांत छुटियाँ 
फिर उड़ेंगे
5)

खो गये कहीं
चाँद तारे नज़ारे
साथी हमारे
६)

दिशाविहीन 
भटक जाते राही 
राहे चलती

७)

पहुँचा देंगी 
किसी मंजिल तक 
चलती राहें 
८ )

देखा जो तुम्हे

लगे गुनगुनाने
गुजरे लम्हे
९_)

हम हैं वहीँ
और तुम भी वही
वक्त बदला

१०)

तुम सागर 
मैं होती जो सरिता 
मिलन होता 

११)
खुशियाँ नही
अक्सर धोखा देती
मायूसियाँ भी
१२)
बंदूक चुप
बरसे कुछ शब्द
रिश्ते घायल

१३)

जीवन ग्रंथ
अनूठी प्रश्नावली
अनसुलझी

१४)


शूल नही माँ 
बन फूल खिलुंगी 
तेरे अँगना

१५)


मानो ना मानो
मुझमे चीखता है
तुम्हारा मौन

१६)


जात की खाई
आरक्षण का पुल
पाट न पाई

१७ )


चुनावी खेल
जाति समीकरण
प्रतिभा फेल

१८)

गहरा कूप
संचित जलराशि
रोग अकूत

१९)

देती जीवन
जल की हर बूंद
खोलो बंधन
२०)

ढला दिवस
थकी जर्जर काया
ढूंढती छाया
२१)

मन के रिश्ते 
बंधे प्रीत की डोर
सदा निभते 

२२)


संजोये रखे 
फूलों से बेहतर 

तेरे सितम 

कविता के सात रंग .-- आकाशवाणी भवन में मेरा प्रस्तुतीकरण


कविता के सात रंग .-- आकाशवाणी भवन में मेरा प्रस्तुतीकरण
साथ  ही वह पढ़े गए कुछ नए हैकुज़ ..हार्दिक आभार आदरणीय +Dr.jagdish vyom सर जी का जिन्होंने मुझे आकाशवाणी में हाइकू पाठ  का मौका दिया | आपसदा ही मेरे लिए प्रेरणा श्रोत रहें है  आपके आशीर्वाद और मार्गदर्शन की सदा आकांक्षी रहती हूँ |





बांटे सुगंध 
फूलों से लूट कर
विद्रोही हवा


धीर पर्वत कभी चंचल नदी नारी का चित्त
पर्वत गोदी बाबुल का आँगन खेलती नदी चीर के बढ़ी रूढ़ियों का पर्वत घायल नदी
 जलाती  रिश्ते
शक कि सिगरेट
बचती राख

व्यर्थ न जीती
सुखी हुयी नदिया
रेत बांटती

आई थी बाढ़
काश बहा ले जाती
मन की व्यथा

कोई न सगा
साये भी देते दगा
दिन ढलते

वर्षा ने छुआ
झुर्री  भरी  दिवार
सिसक उठी

बूढी हड्डीयां
सहलाने आ गयी
जाड़े की धूप

मृत जो हुयी
संवेदनाएं मेरी
मैं जीती गयी 

रविवार, 11 मई 2014

मात तेरी ममता



ओर न छोर 
मात तेरी ममता 
जीवन डोर 



माँ नहीं साथ 
बाते जीवनभर 
थामती हाथ 

माँ का आँचल 
लहराता सागर 
प्रेम तरंग 

बंधती नही 
परिभाषाओ मे माँ
विराट सृष्टि 

तोड़ पत्थर 
गढ़ती है भविष्य 
माँ कलाकार 




माँ जल जैसी 
जिस पात्र में घुसे 
ढलती वैसी 

वज्र सी दृढ़ 
कभी फूल से नर्म 
माता का उर 

माँ हिमखंड 
सहे ताप प्रचंड 
लुटाये  नीर 


बनी कुमाता 

ममता खातिर ही 

कैकेयी माता



रूप हजार 
बरसाती है मैया 
केवल प्यार 




रविवार, 4 मई 2014

खेत बगान - समाज कल्याण मई अंक में प्रकाशित हाइकू


१)
खेत बागान
नहर पनघट
यादो में बसे
२)
खो गयी कहीं
रुनझुन घंटियाँ
रहट  सूने
३)
 पगडंडियां
सड़को से जा मिली
मिटी  दूरियां
४)
नारी चेतना
नवक्रांति ले आई
टूटी बेड़ियां

५)
पसारे पांव
जहरीली हवाये
सिमटे गांव
६)
टूटी डगर
बनी चौड़ी सड़क
विकास दर
७)
प्रगति हुयी
अल्हड पगडण्डी
सोती ही रही
८)
बुढ़ा पीपल
चौपाल पर बैठा
प्रतीक्षारत
९)
हाट व मेले
प्राचीन संस्कृतियां
रखे है जिन्दा
१० )
खेत जोतते
ककहरा पढ़ते
ग्रामनिवासी
११)

अंतरजाल

गाँवों  तक पहुंची
क्रांति मशाल
१२)
खोजे गोरियां
पनघट को जाती
पगडंडियाँ
१३)
मन लुभाती
शहरी चकाचौंधग्राम भ्रमित
१४)
अपना गाँव
तपती दुपहरी
शीतल छाँव